लालदास जी का श्री जी से मिलाप
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ४३
ठट्ठानगर में श्री प्राणनाथ द्वारा बहुत चर्चा हुई तथा अनेक लोग उनके ज्ञान से प्रभावित होकर सुन्दरसाथ में शामिल हो गए ।
चतुरा नामक एक ब्राह्मण प्रतिदिन श्री जी के लिए दूध लाने की सेवा करता था । जब उसने चर्चा में ब्रज-रास का वर्णन सुना, तो वह अचम्भित हो गया । उसकी प्रतिदिन लालदास जी से उनके गोदाम में भेंट होती थी ।
एक दिन चतुरा ने लालदास जी से पूछा- "आप तो कहते हैं कि ब्रज और रास की लीला अखण्ड है, तो वह कहां अखण्ड है ?"
लालदास जी ने उत्तर दिया- "ब्रज और रास की लीला इसी संसार में अखण्ड है, परन्तु वह हमारी लौकिक आँखों से दिखाई नहीं देती ।"
चतुरा ने पुनः पूछा- "आपको ऐसी दिव्य दृष्टि कब मिलेगी, जिससे उन लीलाओं का दर्शन हो सके ? जब महाप्रलय में पांच तत्व और तीन गुण से बने इस ब्रह्माण्ड का नाश हो जाता है, तब अखण्ड ब्रज और रास की लीला कहां रहती है ?"
चतुरा की बात सुनकर लालदास जी चौंक गए और पूछने लगे- "तुमने यह बात कहां सुनी ? मुझे वह स्थान बताओ ।"
तब चतुरा ने उत्तर दिया- "कोई साधू यहां आए हुए हैं, जो ब्रज-रास की चर्चा बहुत जोर-शोर से करते हैं ।"
लालदास जी ने कहा- "मुझे उनके पास ले चलो, ताकि मैं भी उनसे मिलकर उनकी कृपा पा सकूं ।"
चतुरा ने कहा- "मैं उनसे पूछकर आपको ले चलूंगा । बिना उनके हुक्म के मैं आपको उनके चरणों में नहीं ले जा सकता ।"
चतुरा ने श्री जी के पास आकर विनती करी- "लक्ष्मण जी (लालदास जी) आपका दर्शन करना चाहते हैं । वे निश्चित रूप से आपसे मिलने के लिए व्याकुल हैं ।"
कुछ लोगों ने श्री प्राणनाथ जी को लालदास जी से न मिलने की सलाह दी, परन्तु श्री जी ने किसी की बात नहीं मानी और चतुरा को उन्हें ले आने के लिए कहा । श्री जी से अनुमति लेकर चतुरा लालदास जी को अपने साथ उनके चरणों में ले आए ।
श्री प्राणनाथ जी का दर्शन करके लालदास जी को बहुत प्रसन्नता हुई । उनके मन की सारी दुविधा मिट गई और सारे दुःख भाग गए । जब लालदास जी ने श्री जी के मुख से ब्रज लीला की चर्चा सुनी, तो उनके मन में ईमान आ गया और अपने आत्मिक स्वरूप की पहचान हो गई । डेढ़ घण्टे की चर्चा सुनकर उनका मन प्रफुल्लित हो गया और घर लौटने पर भी उनका चित्त श्री राज के चरणों में ही लगा रहा । इसके बाद भी वे दो-चार बार चर्चा सुनने आए ।
एक दिन जब लालदास जी बाग में टहल रहे थे, तो जिन्दादास ने उनसे कहा- "आपने परमधाम के ज्ञान पर कुछ विचार किया ?"
लालदास जी द्वारा पूछने पर जिन्दादास ने उन्हें मारकण्ड ऋषि की चर्चा सुनाई और इस दृष्टान्त के माध्यम से श्री जी के स्वरूप की पहचान करवाई ।
तब लालदास जी की भीतरी दृष्टि खुली और उनके अन्दर जाग्रत बुद्धि का प्रवेश हो गया । उन्हें गीता और भागवत के सभी रहस्यों का भेद खुल गया । अखण्ड निधि प्राप्त होने का उन्हें ऐसा जोश चढ़ा कि अपने शरीर की कुछ सुध ही नहीं रही । उनका चित्त परमधाम और मूल स्वरूप की याद में डूब गया ।
ठट्ठानगर में रहते हुए श्री जी को दस मास हो गए थे । अब उन्होंने वहां से मसकत (ओमान) जाने का संकल्प कर लिया ।
सुन्दरसाथ नहीं चाहते थे कि श्री जी उन्हें छोड़कर जाएं, इसलिए उन्होंने श्री जी से अर्ज करी- "हे प्राणनाथ ! आप ठट्ठानगर में ही विराजिए । श्री बाई जी को हम बन्ध से छुड़ा लाएंगे । श्री राज जी के हुक्म से यह कार्य अवश्य सफल होगा ।"
तब श्री जी ने उत्तर दिया- "वहां मुझे ही जाना होगा । क्या जानें किस प्रयोजन से मेरा वहां जाना हो रहा है ।"
सुन्दरसाथ ने श्री जी से बहुत विनती करी, परन्तु वे नहीं माने । तब सुन्दरसाथ ने उनके निर्णय को मूल स्वरूप श्री राज का आदेश मानकर स्वीकार कर लिया ।
अब श्री जी ठट्ठानगर से लाठी बन्दर गए और वहां से नाव पकड़कर मस्कत (ओमान) पहुंच गए ।
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