मस्कत बन्दर वृत्तान्त
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ४४
श्री प्राणनाथ जी नाव से मस्कत बन्दर (ओमान) पहुंचे और वहां महावजी की दुकान में आकर बैठ गए । महावजी भाई ने उनसे कुशलक्षेम पूछा और उनका बहुत आदर-सत्कार किया ।
श्री जी ने श्री तेज कुंवरी की खोज प्रारम्भ करी, जो अरबी लुटेरों के बन्धन में फंस गई थीं । विश्वनाथ जी, रूपा बाई और राधा बाई भी बन्ध से छूटकर आए थे, अतः उन्होंने श्री तेज कुंवरी की कुशलता की जानकारी दी ।
महावजी भाई ने अपने घर के पास श्री जी के रहने और भोजन की व्यवस्था कर दी । अब वे स्वयं आदरपूर्वक श्री जी की सेवा करने लगे । अपने पुत्र कान्हजी को दुकान पर बैठाकर महावजी पूरा समय श्री जी के साथ रहने लगे ।
श्री जी ने महावजी और अन्य लोगों को ठट्ठानगर की बीतक विस्तार से सुनाई । जागनी का वृत्तान्त सुनकर सभी श्रोताओं को बहुत सुख की अनुभूति हुई । उनके मन में बन्धन में रहने का जो दुःख था, वह भी मिट गया ।
श्री जी के मुख से परमधाम की मधुर चर्चा होने लगी । चर्चा सुनकर रूपा बाई और राधा बाई श्री राज पर समर्पित हो गयीं । महावजी भाई को भी कुछ पहचान होने लगी । चर्चा सुनकर उन सबको ऐसा लगा, जैसे सुभान श्री राज साक्षात् उन पर कृपा कर रहे हैं । जैसे-जैसे यह बात फैलने लगी, अन्य लोग भी चर्चा सुनने और दर्शन करने के लिए वहां आने लगे ।
दस-बीस दिन में श्री प्राणनाथ बहुत जोश में चर्चा करने लगे । जब दज्जाल (माया) ने चर्चा का जोर देखा, तो वह शोर करने लगा । दज्जाल को भय लगा कि श्री जी तो उसका नाश कर देंगे ।
एक तरफ, कुछ लोगों के दिल में बैठकर दज्जाल श्री जी की निंदा करने लगा और संघर्ष के लिए तैयार हो गया । दूसरी तरफ, यहां आनन्दपूर्ण वातावरण में चर्चा और कीर्तन चलता रहा । सुन्दरसाथ को धाम धनी के बिना कोई चाहना नहीं थी ।
श्री राज के आवेश से मस्कत में कुछ किरंतन प्रकट हुए- "रे हो दुनियां बावरी, रे हो दुनियां को तूं कहां पुकारे, रे मन भूल ना महामत ।"
इन किरन्तन का भाव है- हे महामति ! तू दुनिया को क्यों पुकारती है, तू हक की तरफ देख । सब स्याने अपने काम में लगे हैं, जबकि तुझे धाम का विरह सताता है ।
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