बिहारी जी द्वारा श्री जी का निष्कासन
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ५८
बिहारी जी के मन में हमेशा यह शक रहता था कि श्री मेहेराज उनका हुक्म नहीं मानते और अपने को श्रेष्ठ कहलवाते हैं ।
जब बिहारी जी ने यह बात सुनी कि धारा भाई श्री जी के साथ रहते हैं, तो उन्होंने कहा- "जिसे मैं निकालता हूं, उससे मेहेराज दूरी क्यों नहीं रखते ? मैंने रामजी को निकाला, तो उसे भी मेहेराज ने अपने साथ रख लिया । यह उसने अच्छा नहीं किया । मुझे इस बात से दुःख पहुंचा है ।"
श्री जी साहिब जी को पता चला कि बिहारी जी इस बात से दुःखी हैं कि वे बिहारी जी द्वारा निष्कासित सुन्दरसाथ को शरण देते हैं । बिहारी जी को यह भी लगता है कि उन्होंने बिहारी जी से मुख फेर लिया है ।
तब श्री जी ने कहा- "जो भी लूला-लंगड़ा (दुःखी, असहाय) सुन्दरसाथ है, इन्द्रावती उन्हें छोड़ेगी नहीं, अपितु हाथ पकड़कर पहुंचाएगी ।"
इसी दौरान बिहारी जी ने श्री जी को पत्र लिखा- "हमने यहां तीन नियम बनाए हैं । तुम भी वहां इन नियमों का पालन करो । पहला, नीच जाति के व्यक्ति को तारतम नहीं देना । दूसरा, किसी विधवा स्त्री को तारतम नहीं देना । तीसरा, तुम्हारे और मेरे अतिरिक्त कोई अन्य तारतम न दे । इससे हमारा सम्प्रदाय उज्जल होगा और कोई इसकी निंदा नहीं करेगा ।"
तब श्री जी ने उस पाती का उत्तर लिखा-
"आप बाहरी दृष्टि छोड़कर अन्दर की नजर से देखिए । मैं आपके बनाए तीन नियमों का उत्तर लिखकर भेज रहा हूं, उस पर विचार करिएगा ।
"श्री देवचन्द्र जी ने ऐसी राह चलाई है, जिसमें उन्होंने जाति व भेष पर आधारित अन्तर को मिटा दिया और जिसके अन्दर भी परमधाम के अंकुर (आत्मा) को देखा उस पर कृपा करी ।
"इस बात का स्पष्ट उदाहरण खोजी बाई है जो एक मुस्लिम विधवा स्त्री थी, फिर भी श्री देवचन्द्र जी ने उसके अन्दर परमधाम की आत्मा को पहचानकर तारतम दिया । परमधाम की आत्माएं चारों वर्णों में आई हैं । आपके बनाए बन्धन से तो जागनी कार्य बन्द हो जाएगा ।
"श्री देवचन्द्र जी ने यह भी कहा था कि यह अखण्ड परमधाम की आत्माओं की लीला है और इसके प्रताप से समस्त ब्रह्माण्ड को मुक्ति मिलेगी, तो हम दो लोग पूरे संसार में तारतम का प्रचार कैसे कर सकते हैं ? इसलिए जिसे भी तारतम मिले, वह दूसरों तक इसका प्रकाश फैलाए ।"
श्री प्राणनाथ जी ने इस प्रकार का उत्तर लिखकर कलस ग्रन्थ के साथ बिहारी जी को भेज दिया । जब बिहारी जी ने उस पाती को पढ़ा, तो उन्हें बहुत दुःख हुआ और उन्होंने कलस ग्रन्थ को मानने से मना कर दिया ।
बिहारी जी ने पुनः श्री जी को पाती लिखकर भेजी- "आज से तुम्हारी और मेरी राह अलग-अलग है । मैंने पहचान लिया है कि तुम्हारे अन्दर कविता लिखने का गुण है । अब तुम हमारे सुन्दरसाथ में नहीं हो, मैं तुम्हें परमधाम से निकाल रहा हूं । मैंने जिस सुन्दरसाथ को निकाला, तुमने उन्हें समाज में वापस क्यों लिया ? इसका अर्थ है कि तुम्हें मेरे निर्णय पर भरोसा नहीं है, इसलिए मैं तुम्हें सुन्दरसाथ से निकाल रहा हूं । मेरा तुमसे कोई नाता नहीं रहा, इसलिए अब कभी मुझे पाती भी मत लिखना ।"
बिहारी जी द्वारा लिखी गई इस तरह की पाती पढ़कर श्री जी अवाक रह गए । वे सोचने लगे- "कितना कठिन समय आ गया है । मैंने क्या अपराध किया था, जो मुझे ऐसे शब्द लिखकर भेजे ? परमधाम की ब्रह्मसृष्टि को ऐसा करना शोभा नहीं देता ।"
अब सब सुन्दरसाथ बैठकर विचार-विमर्श करने लगे- "श्री देवचन्द्र किसके हृदय में विराजमान हैं ?"
सबने मिलकर श्री जी साहिब जी से कहा- "सुन्दरसाथ को जाग्रत करने का कार्य आप अपने सिर पर ले लीजिए । बिहारी जी ने चर्चा करके आज तक किसी को भी पहचान नहीं कराई । उल्टा जिस सुन्दरसाथ को समझाकर आप उनके पास भेजते हैं, वह भी शंकाग्रस्त होकर लौटता है । अब आप अधिक मत सोचिए । अपनी नजर धाम की तरफ करिए और धर्म के इस कार्य को अपने सिर ले लीजिए ।"
भीम भाई ने आगे बढ़कर श्री जी के वास्तविक स्वरूप को उजागर किया- "जिन्हें हम श्री मेहेराज मानते हैं, उनके अन्दर ही हमारे धाम धनी श्री प्राणनाथ विराजमान हैं ।"
इस प्रकार भीम भाई ने सब सुन्दरसाथ को श्री जी की पहचान कराई । इस कार्य के लिए उन्हें बहुत शोभा मिली ।
तब श्री जी ने बिहारी जी की पाती का उत्तर लिखकर भेजा- "आपने मुझे सुन्दरसाथ से निकाल दिया, परन्तु मैंने जागनी का कार्य अपने सिर ले लिया है । यदि इसमें मेरा कोई स्वार्थ होगा, तो मेरा कोई कार्य सफल नहीं होगा । यदि सुन्दरसाथ की भलाई के लिए मैं परिश्रम करूंगा, तो मेरा कार्य अवश्य सफल होगा । मैंने तो निजधाम के कार्य के लिए कमर बांधी है ।"
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