योग दर्शन के आचार्यों से चर्चा
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ७९
तब योग दर्शन के विद्वानों ने श्री प्राणनाथ जी से कहा-
"हम मानते हैं कि ब्रह्म सम्पूर्ण जगत के कण-कण में व्यापक है । जब आप शुद्ध हृदय से नाड़ियों और चक्रों का शोधन करेंगे, तब आपको अपने शरीर में ही ब्रह्म मिल जाएंगे ।
"योग के आठ अंग हैं- यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह), नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणिधान), आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि ।
"आप ब्रह्म को ज्योति स्वरूप ही मानिए और वही इस जगत का मूल कारण है । ब्रह्म से ही समस्त जगत की उत्पत्ति होती है और यह जगत उस ज्योति स्वरूप ब्रह्म में किरणों के समान स्थित है ।
"आप बिना संशय किए इस सार रूपी मत को अपने हृदय में धारण कीजिए ।"
श्री जी ने पूछा-
"आप चित्त देकर मेरी इस आशंका को मिटाइए । ब्रह्म तो सत्, चित् और आनन्द स्वरूप है, जबकि जगत तो असत्, जड़ और दुःख रूपी है । सत् वस्तु से सत् की उत्पत्ति होती है, जबकि असत् वस्तु से असत् की ही उत्पत्ति होती है ।
"श्रुतियों में कहा गया है कि ब्रह्म इच्छा से रहित है और उसमें कुछ भी उत्पन्न-लय नहीं होता, जबकि माया (कारण-प्रकृति) से इस जगत की उत्पत्ति और लय होता है । वेद कहते हैं कि माया में ब्रह्म के मन का प्रतिबिम्ब पड़ता है, जिसकी शक्ति से जगत प्रकाशित होता है । फिर ज्योति स्वरूप ब्रह्म (सत्) से किरण रूपी जगत (असत्) की उत्पत्ति कैसे हो गई ?
"सूर्य और किरणों में भेद नहीं होता, जबकि ब्रह्म और माया में बहुत भेद है । दोनों परस्पर प्रतिवादी हैं और कभी एकसाथ नहीं रह सकते । फिर ब्रह्म में जगत कैसे स्थित हो सकता है ?
"आप इन महत्वपूर्ण बातों पर विचार करिए । मैंने प्रमाण सहित सब कुछ कह दिया है । कृपया मेरे प्रश्नों का उत्तर दीजिए ।"
श्री जी की बातें सुनकर योग दर्शन के विद्वान मौन हो गए ।
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