विरह
प्रियतम परब्रह्म से अलगाव की स्थिति में विरहणी उनसे मिलने और उनका प्रेम पाने के लिए तड़पती रहती है, उस अवस्था को विरह कहते हैं ।
विरह किसे होता है ?
सुहागन नारी (ब्रह्मसृष्टि) के अतिरिक्त ब्रह्माण्ड में किसी (जीव) के पास विरह नहीं है । सुहागन प्रियतम (अक्षरातीत) की आत्मा है और उसका घर पार (बेहद) के पार (धाम) है । आज दिन तक इस ब्रह्माण्ड में ये विरहणी नहीं थीं । वही सुहागन (अब संसार में) आई हैं, जो खसम की विरहणी हैं । इन्हें अन्दर से पिया ने पकड़ रखा है, नहीं तो (प्रियतम के विरह में) इनका तन न रहे ।1
विरह का महत्व
मैं (इन्द्रावती की आत्मा) सुहागन कहलाती हूं । यदि मैं अपने जीव को विरह में न डुबोऊं, तो बाद में धाम जाकर मैं प्रियतम को (शर्मिन्दगी के कारण) अपना मुख कैसे दिखाऊंगी ?2
यदि (प्रियतम के लिए) मैं अपना जीव देने में संकोच करती हूं, तो मेरा धर्म कैसे सुरक्षित रहेगा ? विरह के सामने जीव (पंचभौतिक शरीर) का क्या महत्व है ? यह बात कहने में भी मुझे शर्म लगती है ।3
मैं माया के इस शरीर और जीव को काटकर, टुकड़े करके उस दिशा पर न्यौछावर कर दूं, जिस दिशा में तेरा विरह मिलता है ।4
(प्रियतम की छवि) नजरों से एक पल के लिए भी अलग नहीं होती, इसलिए (विरहणी के) पलक नहीं झपकते । अन्दर तो वह न्यारा (अलग) नहीं है, परन्तु (विरह में) जले बिना (उसका साक्षात्कार) नहीं मिलता ।5
तुमसे बिछड़ने का जो दुःख (विरह) है, मुझे उससे प्यार हो गया है । तेरे विरह में इतना सुख है, तो विहार (मिलन) में कैसा सुख होगा ?6
विरह में शरीर की स्थिति
विरह की अवस्था में विरहणी की स्थिति कैसी होती है, उसका एक उदाहरण यहां प्रस्तुत है-
हे पिया ! मुझे शान्ति नहीं आ रही, न ही नैनों से कुछ आंसू आते हैं । आपके बिना जो पल बीतता है, उसमें शरीर निरन्तर (विरह की अग्नि में) जलता रहता है ।7
(ऐसा प्रतीत होता है कि) सभी अंग अग्नि (विरह) में जलकर धूल की भांति उड़े जा रहे हैं । जहां दुल्हे के वियोग का दर्द हो, वहां शान्ति कैसे आ सकती है ?8
(विरह में ऐसा लगता है जैसे) एक-एक हड्डी पिस रही है, जिस प्रकार चक्की में अन्न पिसता है । जब जीव को आराम (मिलन का आनन्द) नहीं होएगा, तो शान्ति कैसे उपज सकती है ?9
(विरह में ऐसा प्रतीत होता है कि) सब अंग शत्रु होकर समस्त सन्धियों को छेद रहे हैं और अपनी ही इन्द्रियां आप को खाने लगी हैं (मन को पीड़ा पहुंचा रही हैं) ।10
पूरे शरीर को विरह ने खा लिया है और रक्त व मांस गल गए हैं । श्वांस इस प्रकार सूख रहे हैं कि न अन्दर आते हैं, न बाहर जाते हैं ।11
सब हड्डियां लकड़ी हो गए और सिर नारियल हो गया । मांस, मज्जा, रक्त और नसों की सामग्री हो गई । इस प्रकार विरह की अग्नि में सब हवन हो गया ।12
(विरह में ऐसा अनुभव होता है जैसे शरीर के) रोम-रोम में सुए चुभ रहे हैं और तलवार की धार से खण्ड-खण्ड हो गया है । हे पिया ! उसका दुःख पूछ जो तेरी विरहणी नारी है ।13
विरह की पीड़ा
इस (विरह के) दर्द को वही जान सकता है, जिसके कलेजे में घाव लगे । इस दर्द की कोई दवा नहीं है और यह लगातार फैलता जाता है ।14
तेरा यह (विरह का) दर्द कठिन (पीड़ादायी) है । इसमें आभूषण अग्नि के समान जलाने वाले लगते हैं । स्वर्ण और हीरे से बनी पश्मीने की सेज्या भी हृदय में आग लगाती है ।15
विरह में संसार की निरर्थकता
वल्लभा (प्रिया) से विरह नहीं छूटता, भले ही अनेक विघ्न (सांसारिक सुख) क्यों न पड़ जाएं । मैं न तो शरीर देखती हूं, न ब्रह्माण्ड देखती हूं, सिर्फ अपने एक दुल्हा को देखती (चाहती) हूं ।16
विरहणी ने विरह के बीच में ही अपना घर बना लिया है । मैं चौदह लोक की साहेबी (स्वामित्व) को तेरे विरह पर न्यौछावर कर दूं ।17
विरह की आंधी आई जिसने ब्रह्माण्ड (मन की समस्त इच्छाओं) को उड़ा दिया । विरहणी गिरी (निराशा में डूबी) तो उठ न सकी, बस मूल अंकूर (धाम के सम्बन्ध की आशा) से भरी रही ।18
विरहणी की व्याकुलता
जब अन्दर की नींद (अज्ञानता) उड़ गई, तो चैन कैसे पड़ सकता है ? मेरी आत्मा प्रियतम के दर्शन की प्यासी है कि कब मैं अपने नैनों से उनका मुख देखूंगी ।19
प्रियतम के बिना कुछ भाता नहीं, न जाने कब पिया के वचन सुनूंगी । जब तक पिया मुझे नहीं मिलते, तब तक दिन-रात तड़पती रहूंगी ।20
तेरे दर्द (विरह) के यह लक्षण हैं । विरहणी को गृह या आंगन अच्छा नहीं लगता । रत्नों से जड़ा हुआ कमरा भी उसे उठ-उठ कर खाने को दौड़ता (मन को पीड़ा देता) है ।21
न तो विरहणी बैठ सकती है, न सो सकती है, न रो पाती है । उसकी स्थिति ऐसी होती है जैसे वह पूरी पृथ्वी के राज (समस्त सुख-वैभव) को पांव से दबाकर (ठुकराकर) निकली हो ।22
विरह न बैठने देता है, उठने भी नहीं देता । विरहणी लेटे-लेटे करवट भी नहीं बदल सकती, बस हूक-हूक कर (हृदय की पीड़ा के साथ) श्वांस लेती रहती है ।23
विरह का फल
इस प्रकार तुम (श्री राज) ने मुझ (इन्द्रावती) को अपनी अंगना जानकर (दर्शन) दिया । निश्चित रूप से बीच का परदा (अहं की बाधा) हटाने के लिए ही विरह दिया था ।24
जब (विरह की) आह शरीर में सूख गई और श्वांस ने भी साथ छोड़ दिया (प्राण छूट गए), तब तुमने पर्दा (माया) टालकर मुझे अपना अंग (साक्षात्कार) दिया ।25
मैं तो अपना (जीवन) दे रही थी, परन्तु तुमने ही जीव को सुरक्षित रखा । आपने शक्ति देकर अपने कार्य (जागनी) के लिए मुझे खड़ा किया ।26
तुम्हारे आने (साक्षात्कार) से सब कुछ (निधि) आ गया और (विरह का) सब दुःख दूर हो गया । महामती कहती है कि मेरे अन्दर जो मूल (धाम) का अंकुर जाग्रत हुआ है, उसका सुख कैसे कहूं ।27
विरह पर ज्ञानमयी प्रकाश
इस विरह के लक्षण मैंने कहे हैं, परन्तु यदि कोई इस प्रकार विरह करने का प्रयास (नकल) करता है तो उसे विरह नहीं है ।28
प्रियतम का विरह (वियोग) सुनते ही जिसकी आह न निकल जाए, वतन की सैयां (सखियां) कहती हैं कि वह विरहणी नहीं है ।29
जब मैं विरह में थी, तब मुख से कुछ बोलने में असमर्थ थी । यह वचन (विरह से सम्बन्धित) तो मैंने तब कहे, जब प्रियतम ने मुझे (विरह से) उठा लिया ।30
जिस प्रकार यह (तामस का) विरह उत्पन्न हुआ, यह हमारा धर्म नहीं है । विरहणी कभी इस प्रकार विरह का अनुसरण (नकल) न करे ।31
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