चिन्तामणि बोध
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ४२
श्री प्राणनाथ को पता चला कि ठट्ठानगर में कबीर पन्थ के एक प्रसिद्ध साधू चिन्तामणि जी रहते हैं । उनसे भेंट करने के उद्देश्य से श्री जी उनके निवास गए । श्री जी को देखते ही चिन्तामणि को सुख की अनुभूति हुई ।
चिन्तामणि ने कहा- "आप कहां से आए हैं ? आप हमसे ज्ञान की वार्ता करिए । यदि आपको अधिक ज्ञान है तो आप हमें सुनाइए, या आप सुनिए हम आपको आत्म तत्व की चर्चा सुनाते हैं । यदि आप देने आए हैं तो दीजिए, यदि आप लेने आए हैं तो हम देते हैं । आप कहें तो हम आपको चतुर्भुज स्वरूप, या ज्योति स्वरूप, या सहस्त्र फनों वाले शेषनाग, या झिलमिल ज्योति का दर्शन करवा दें, या अनहद ध्वनि को सुनवा दें । अन्यथा आपने जो पाया है, वह हमें दिखाइए ।"
श्री प्राणनाथ ने उत्तर दिया- "हम तो वस्तु लेने आए हैं । आप हमें परम तत्व के बारे में बताइए ।"
दोनों के बीच तत्व ज्ञान पर वार्तालाप चल रहा था, तभी कमाल (कबीर जी के पुत्र) की एक साखी पर विशेष चर्चा होने लगी ।
"कह्या कौड़ी ते हीरा भया, हीरा ते भया लाल । आधा भक्त कबीर है, पूरा भक्त कमाल ॥"
जब श्री जी ने जोश में इस साखी की विवेचना की, तो चिन्तामणि का ध्यान उनकी तरफ आकर्षित हुआ ।
श्री जी ने कठोर शब्दों में कहा- "तुम कबीर जी के बारे में कुछ नहीं जानते, इसलिए तुमने उन्हें आधा भक्त कहा है । यदि कबीर जी और कमाल की तुलना करके देखो, तब तुम्हें पता चलेगा कि किसकी स्थिति क्या है ।"
तब श्री जी ने कबीर जी का एक कीर्तन सुनाया, जिससे चिन्तामणि बहुत प्रभावित हुए । वह कीर्तन इस प्रकार है-
"एक पलक ते गंग जो निकसी, हो गया चहुं दिस पानी । उहि पानी दो परवत ढांपे, दरिया लहर समानी ॥ उड़ मक्खी तरवर चढ़ बैठी, बोलत अमृत बानी । वह मखी के मखा नाहीं, बिन पानी गरभानी ॥ तिन गरभें गुन तीनों जाये, वह तो पुरुष अकेला । कहे कबीर या पद को बूझे, सो सतगुरु मैं चेला ॥"
इस कीर्तन को सुनकर चिन्तामणि जी अपने शिष्यों से कहने लगे- "अब देखो इनके शब्द संसार से पार पहुंच गए हैं । जिस महापुरुष की मुझे खोज थी, यह वही हैं ।"
इतने में श्री जी साहिब जी वहां से उठकर वापस आ गए ।
इसी प्रकार एक दिन श्री प्राणनाथ जी कल्लू मिश्र के घर होने वाली कथा में भी गए । सुन्दरसाथ ने कल्लू मिश्र की चर्चा सुनी, परन्तु उनका ज्ञान कच्चा था ।
श्री जी के अचानक चले आने को बाद चिन्तामणि उनको खोजते रहे । पूरा दिन खोजते-खोजते भोर में वे कल्लू मिश्र की कथा में पहुंचे । कल्लू मिश्र ने उन्हें नाथा जोशी के घर का पता बताया, तब चिन्तामणि श्री प्राणनाथ के चरणों में पहुंचे ।
उस समय श्री जी सुन्दरसाथ को चर्चा सुना रहे थे, तो चिन्तामणि भी अपने शिष्यों सहित चर्चा सुनने बैठ गए । परमधाम का अंकुर होने के कारण चिन्तामणि को चर्चा बहुत अच्छी लगी, परन्तु उनके शिष्यों में खलबली मच गई ।
इस प्रकार दो-तीन दिन तक वे सभी ध्यान से श्री जी के मुख से चर्चा सुनते रहे । तब उन्हें इस बात की पहचान हो गई कि श्री जी के रूप में साक्षात् परब्रह्म ही लीला कर रहे हैं, अतः सभी उनके चरणों में नतमस्तक हो गए ।
एक दिन चर्चा में श्री जी ने चिन्तामणि की खण्डनी कर दी । चर्चा के पश्चात् एकान्त में चिन्तामणि ने श्री जी से कहा- "आप सबके बीच में मेरा सम्मान बचाए रखिए । भले आप एकान्त में मेरी कितनी भी खण्डनी करिए, परन्तु मेरे सेवकों के सामने मेरा मान रखिए ।"
तब श्री जी ने कहा- "हे चिन्तामणि ! मैं तुम्हारे सम्मान का ध्यान क्यों नहीं रखूंगा ? अब मैं तुमको सब कुछ संकेत में कहा करूंगा ।"
रात्रि में श्री प्राणनाथ जी को एक किरंतन उतरा- सुनो रे सत के बनजारे, एक बात कहूं समझाई ।
इस किरंतन में ज्ञानी लोगों की खण्डनी की गई है कि उन्हें अपने ज्ञान का अहंकार छोड़ देना चाहिए ।
प्रातः जब चिन्तामणि ने उसे पढ़ा, तो उसे अपनी भूल का आभास हुआ और वह अपने सेवकों के सामने जोर-जोर से कहने लगा- "अब मैं लाठी से अपने अहंकार रूपी काले कुत्ते को मार डालूंगा । मैं खाली हूं, मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है ।"
तब श्री जी ने चिन्तामणि की सराहना करते हुए कहा- "शाबाश चिन्तामणि ! तुमने अपने आत्मिक स्वरूप को पहचान लिया है और ऐसे वचन तो एक ब्रह्मसृष्टि ही बोल सकती है ।"
इसके बाद चिन्तामणि ने अपने सभी शिष्यों सहित श्री प्राणनाथ जी से तारतम लिया । श्री जी ने उन्हें चार बातों का परहेज करने को कहा- मांस, शराब, परायी स्त्री, झूठ बोलना ।
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