प्रेम या इश्क
परमात्मा और आत्मा के बीच समरसता की जो पवित्र भावना होती है, उसे प्रेम या इश्क कहते हैं ।
प्रेम का मार्ग
प्रेम की घाटी कठिन और अति विकट है । तीनों बल (कर्म, उपासना, ज्ञान) वाला कोई भी शूरवीर इस दुर्गम मार्ग पर नहीं चल पाता । इस पर चलने के लिए आत्मा का श्रृंगार (पूर्ण समर्पण) करके तलवार की धार (अहं को छोड़ने के मार्ग) पर चलना पड़ता है । सामने से शरीर के रोम-रोम में (विरह के) भाले चुभते हैं ।1
प्रेम किसमें होता है?
जो कोई ब्रह्मसृष्टि हैं, उनमें पूर्ण प्रेम होता है और उनकी दृष्टि प्रियतम (श्री राज) पर लगी रहती है ।2
संसार में सुहागनियों के प्रेम की परीक्षा
जो हुकम को शिरोधार्य करके अपने अंग को मरोड़कर (माया की निद्रा को त्यागकर) नहीं उठी, तो प्रियतम और सैयां सब देख रहे हैं कि तुम्हारे प्रेम में कितना बल है ।3
जो (इन वचनों को) सुन कर (प्रियतम को पाने के लिए) दौड़ी नहीं, तो उन पर हंसी होगी । जिन में जैसा इश्क है, सो अब जाहिर हो जाएगा ।4
जो इश्क लेकर (प्रियतम से) मिलेगी, सो अपार सुख लेगी । जिसमें दर्द (विरह) नहीं होगा, उसे दुःख होएगा, सो निश्चित जानो ।5
प्रेमी के लक्षण
इश्क का यह लक्षण है कि (विरहणी) अपने नैनों पर पलक नहीं झपकाती । वह (चितवन से) दौड़ लगाती रहती है । तब भी (साक्षात्कार) न मिल सके, तो अपनी अन्तर्दृष्टि (आत्मिक दृष्टि) को पिया में लगाए रखती है ।6
वे तो छिप कर रहने वाले प्रेमी हैं । उनके लिए सब कुछ तुच्छ हो गया है । वे प्रियतम (परब्रह्म) के प्रेम में खेलते (मग्न रहते) हैं और सब कुछ (सांसारिक बातें) भूल गए होते हैं ।7
उनकी सुरता (ध्यान) संसार में नहीं रहती, उसी तरफ (धाम में) लगी रहती है । वे प्रेम में मग्न रहते हैं और उनका सब कुछ (सांसारिक इच्छाएं) नाश हो चुका होता है ।8
प्रेमी तो निश्चित रूप से छिपे रहते हैं । उनके मुख से बोला भी नहीं जाता । यदि उनके मुख से कोई शब्द निकलता भी है, तो कोई ज्ञानी उसका अर्थ नहीं समझा सकता ।9
इश्क की महिमा
इश्क (प्रेम) सब (निधियों) में बड़ा है, उसके समान कोई नहीं है । एक तेरे (श्री राज के) इश्क के बिना सारा संसार उड़ गया (निरर्थक) है ।10
चौदह लोक की सीमा है, शून्य और निरञ्जन (निराकार) की भी सीमा है, परन्तु जिस इश्क के बल से प्रियतम (श्री राज) और धाम को देखा जा सकता है वह सीमा से परे है ।11
एक (आदि नारायण) और अनेक (जीवों) का हिसाब (गणना) हो सकता है । निराकार-निर्गुण को भी सीमाबद्ध किया जा सकता है । इश्क हिसाब से न्यारा (परे) है, जो तुम्हारे (श्री राज के) बिना कुछ और नहीं देखता ।12
और इश्क के बारे में कोई कुछ मत कहो, क्योंकि कोई भी इश्क तक पहुंच (समझ) नहीं सका । इश्क की पहुंच वहां (धाम में) है, जहां शून्य और शब्द (लौकिक भाषा) नहीं होते ।13
(1) कलस हिन्दुस्तानी 3/2 (2) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/27 (3) कलस हि. 11/25 (4) कलस हि. 11/26 (5) कलस हि. 11/27 (6) कलस हि. 7/9 (7) कलस हि. 2/43 (8) कलस हि. 2/44 (9) कलस हि. 2/45 (10) कलस हि. 7/1 (11) कलस हि. 7/2 (12) कलस हि. 7/4 (13) कलस हि. 7/5
