माया
प्रकृति ही माया है । माया को कलियुग, छल, मोह, आदि अनेक नामों से जाना जाता है ।
माया के दो प्रकार हैं- काल माया और योग माया ।
काल माया
यह अनित्य क्षर ब्रह्माण्ड काल माया के अन्तर्गत आता है । काल माया को कलियुग, दज्जाल या शैतान भी कहते हैं ।
पूरी नींद का जो सपना होता है, उसी का नाम काल माया रखा गया है ।1
यह (माया) ऐसी चतुर नारी है, जो देखते ही देखते सबको छल लेती है ।3
यह (माया) ऐसी अलख है, जिसे आदि से लेकर आज तक कोई भी लख (समझ) नहीं सका । यह ऐसी निराकार और निरंजन (दोष रहित) है, जो सकल (जगत) में विस्तृत है ।2
ऊपर, नीचे, अन्दर और बाहर दसों दिशाओं में यह (माया) है । कोई भी इसको छोड़कर प्रियतम (परब्रह्म) के धाम के विषय में नहीं कहता ।4
इस प्रकृति (माया) को न तो कोई देख पाता है, न कोई पार कर पाता है, न ही उसकी कुछ पहचान होती है ।5
मोह (माया) के जल का प्रवाह अत्यन्त शक्तिशाली और इतना तेज है कि अंगुली के नाखून को तोड़कर साथ ले जाए ।6
इसकी बड़ी तरंगें मेरु (पर्वत) के समान हैं । इसमें कोई खड़ा (धर्म पर टिका) नहीं रह सकता । यह (माया) घेरकर (तृष्णा रूपी) लहरों पर लहरें मारती है, फिर बीच भंवर (आवागमन के चक्र) में फंसा देती है ।7
गुण (सत, रज, तम), पक्ष, अंग (अन्तःकरण), इन्द्रियां (कर्मेन्द्रियां और ज्ञानेन्द्रियां) उल्टे (माया की तरफ) चलते हैं और सब जोर लगाते हैं ।8
(1) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/32 (2) कलस हिन्दुस्तानी 2/17 (3) कलस हि. 2/32 (4) कलस हि. 2/19 (5) कलस हि. 2/22 (6) प्रकास हि. 37/84 (7) प्रकास हि. 37/85 (8) कलस हि. 21/24
