लक्ष्मी दास पर हांसी
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ६५
जब श्री जी साहिब जी दिल्ली में थे, तब सूरत से लक्ष्मीदास अपनी पत्नी रूपा बाई और पुत्री यमुना के साथ उनके चरणों में आए ।
उनके साथ भाई नारायण दास, गोविन्द दास और उनकी पत्नी रामबाई भी श्री राज के चरणों की आस दिल में लेकर पधारे ।
लक्ष्मीदास के घर में चमत्कारिक लीला होने लगी । लक्ष्मीदास को खुली आँखों से श्री राज के अलौकिक स्वरूप का दर्शन होने लगा और उनके मन में कुछ भी संशय नहीं रहा ।
श्री राज आवेश स्वरूप से आकर नित्य भोजन करने लगे, इसलिए लक्ष्मीदास के अन्दर माया का कुछ भी विकार नहीं रहा ।
श्री राज के मन में हांसी करने की इच्छा थी, इसलिए उन्होंने एक दिन लक्ष्मीदास को वादा कर दिया- "आज से आठवें दिन तुम्हारे माध्यम से सकुमार बाई (औरंगज़ेब) की आत्मा जाग्रत हो जाएगी ।"
लक्ष्मीदास ने यह बात सबको बता दी ।
जब श्री जी ने यह बात सुनी, तब उन्होंने लक्ष्मीदास का बहुत आदर किया और सुन्दरसाथ से कहा- "लक्ष्मीदास जी को मेरे बगल में बैठाइए । जिस पर श्री राज की कृपा होती है, वह मेरे आगे होकर औरंगज़ेब की जागनी का कार्य करे । यदि कोई सुन्दरसाथ मेरे आगे होता है या मेरे बराबर बैठता है, तब भी श्री देवचन्द्र जी की कृपा से मैं उससे अपना चित्त नहीं मोड़ूंगा । अन्यथा सब सुन्दरसाथ मेरे पीछे चलें और तारतम वाणी के प्रकाश से अपनी आत्मा को जाग्रत करें ।"
तब लक्ष्मीदास ने कहा- "मैं आपसे आगे नहीं हो सकता, परन्तु आपके बराबर बैठूंगा और सकुमार की आत्मा को जगाऊंगा ।"
अगले दो-तीन दिन तक लक्ष्मीदास श्री जी साहिब जी के बगल में बैठते रहे । इस दौरान श्याम भाई और भीम भाई के ताने सुनकर उनका दिल नर्म हो गया और लज्जा के कारण उन्होंने श्री जी के बगल में बैठना छोड़ दिया ।
जब आठ दिन पूरे हो गए, तब श्री राज ने दर्शन दिया ।
लक्ष्मीदास ने उनसे अर्ज करी- "हे परब्रह्म ! अपना वादा पूरा करिए और औरंगज़ेब की आत्मा को जगाइए ।"
यह सुनकर श्री राज अदृश्य हो गए ।
इस घटना के बाद लक्ष्मीदास की सब सुन्दरसाथ के बीच में बहुत हांसी हुई । इस प्रसंग से सुन्दरसाथ को यह शिक्षा मिलती है कि कयामत के समय में जागनी की सारी शोभा महामति (इन्द्रावती जी) की है, जिनके दिल में श्री प्राणनाथ विराजमान हैं ।
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