खेल
अध्यात्म में, खेल से तात्पर्य इस नश्वर संसार से होता है ।
यह खेल (संसार) तो एक क्षण का है, परन्तु लोग इसे अनादि और अनन्त समझते हैं ।1
खेल की प्रकृति कैसी है
यह खेल बलशाली है, बहुत छल (माया) के रूप में इसकी रचना हुई है । यह (भेद) तब जाहिर होगा, जब मैं सब (आत्माओं) को इस (छल) से निकाल कर इसका बल दिखाऊंगी ।2
तुम इस छल (मायावी संसार) के नहीं हो । छल का नशा जोरदार है । छल का बल ऐसा है कि सच्ची (ब्रह्मसृष्टि) को झूठी (माया) लगी हुई है ।3
खेल की उत्पत्ति का कारण
अब मैं खेल (संसार) के उत्पन्न होने के कारण कहती हूं । यह दोनों को इच्छा उत्पन्न हुई । यह (इच्छा) हमारे प्रियतम (श्री राज) ने उत्पन्न करवाई ।4
अक्षर के मन में यह इच्छा उपजी कि धनी जी (श्री राज) की प्रेम लीला को देखें । तभी सखियों के मन में यह (इच्छा) उपजी कि अक्षर का जो खेल है, उसे देखें ।5
तब हम (सखियों) ने जाकर पिया (प्रियतम) से कहा कि हम अक्षर का खेल देखना चाहती हैं । जब यह बात पिया ने सुनी, तब अत्यधिक हांसी (उपहास) करने के उद्देश्य से मना किया ।6
हमें तीन बार मना किया, तब हमने बार-बार-बार वही मांगा । धनी (प्रियतम) कहने लगे कि वहां घर (धाम) की सुध नहीं रहेगी । तुम स्वयं को भूल जाओगी और यह बुद्धि भी नहीं रहेगी ।7
मैं इसलिए मना करता हूं कि तुम मुझे भी भूल जाओगी । तब हमने पुनः प्रियतम से कहा कि माया हम को क्या करेगी ।8
तब हमने मिलकर विचार किया और एक-दूसरी को सावधान रहने के लिए कहा । हमने प्रियतम से खेल देखने की विनती की, तब हम दोनों (अक्षर और ब्रह्मसृष्टियों) पर आज्ञा हुई ।9
यह खेल देखने के दो अलग-अलग कारण कहे हैं ।10
दूसरी बार खेल में आने का कारण
आधा साथ (छह हजार ब्रह्मसृष्टि) अटक रहा था, जो तामसियां नारी हैं, क्योंकि उन्हें खेल देखने की इच्छा (शेष) थी । यह खेल (जागनी ब्रह्माण्ड) मूल रूप से इनकी खातिर बना ।11
खेल में परब्रह्म की लीला
खेल में आने के बाद श्री राज और सखियों ने तीन प्रकार से लीला की-
खेल की समाप्ति
(जब) प्रियतम (धाम में) हंसते हुए ताली बजाएंगे (तब खेल समाप्त होगा) और सब साथ (परात्म) हंसते व सुख लेते हुए उठेंगे ।12
(1) कलस हिन्दुस्तानी 1/32 (2) कलस हि. 12/9 (3) कलस हि. 12/10 (4) प्रकास हिन्दुस्तानी 37/12,13 (5) प्रकास हि. 37/18 (6) प्रकास हि. 37/19 (7) प्रकास हि. 37/20 (8) प्रकास हि. 37/21 (9) प्रकास हि. 37/22 (10) प्रकास हि. 37/23 (11) कलस हि. 12/6 (12) प्रकास हि. 37/118
