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श्री जी की आठ प्रहर की वृत्त

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १३८

अक्षरातीत परब्रह्म स्वरूप श्री जी साहिब जी की महिमा को शब्दों में कहना सम्भव नहीं है । जब वे बंगला जी (पन्ना) में विराजमान हुए, तब सुन्दरसाथ ने उन्हें अपनी आत्मा का प्रियतम मानकर उनकी सेवा की । उस सेवा से सुन्दरसाथ को पल-पल जो सुख मिला, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ।

एक-एक प्रहर में श्री जी की दिनचर्या क्या है और कौन-कौन सुन्दरसाथ उनकी किस प्रकार से सेवा करते हैं, इसका विस्तृत वर्णन श्री लालदास कृत बीतक में उपलब्ध है । यहां संक्षेप में बताया जा रहा है ।

पहले प्रहर (प्रातः ६ से ९) में श्री जी सूर्योदय से पहले अपनी सुन्दर शय्या से उठ जाते हैं । सुन्दरसाथ वाणी गाकर उनको रिझाते हैं और पीने के लिए काढ़ा परोसते हैं । श्री जी नित्य कर्म, स्नान, आदि करके तैयार होते हैं, फिर अपने सिर पर पाग बांधते हैं और गोदड़ी ओढ़ते हैं। महाराज छत्रसाल और श्री बाई जी उन्हें आभूषण पहनाकर श्रृंगार करते हैं ।

इसके बाद श्री जी को बाल भोग (अल्पाहार) परोसा जाता है । जब श्री जी बंगला जी से बाहर जाते हैं, तो मार्ग में सुन्दरसाथ उनके लिए पांवड़े बिछाते हैं और सिर पर छत्र करके साथ-साथ चलते हैं । नौ बजे तक वे अवश्य वापस आ जाते हैं ।

दूसरे प्रहर (प्रातः ९ से १२) में श्री जी अति मीठी चर्चा करते हैं, जिसे सुनकर सुन्दरसाथ को बहुत चैन मिलता है । श्री जी के एक तरफ लालदास और दूसरी तरफ केशव दास ग्रन्थ लेकर बैठते हैं । कुछ सुन्दरसाथ श्री कुलजम सरूप की चौपाइयां लिखते हैं तथा कुछ सुन्दरसाथ चर्चा के वचनों को लिखते हैं ।

मुरलीधर बिना हिले-डुले श्री जी से दृष्टि मिलाकर चर्चा सुनते हैं । चर्चा सुनकर सुन्दरसाथ को परमधाम के सुखों और युगल स्वरूप की शोभा की अनुभूति होती है । श्री जी वेद और कतेब का एकीकरण करते हैं, ब्रज, रास और जागनी लीला का वर्णन करते हैं, माया और ब्रह्म का भेद बताकर जगाते हैं, अपनी तीन सूरतों का वर्णन करते हैं, कयामत के सात निशानों का वर्णन करते हैं । श्री जी की चर्चा के दौरान कोई एक शब्द भी नहीं बोलता ।

इसके बाद राज भोग (दोपहर के भोजन) का समय हो जाता है । लगभग सवा ग्यारह बजे, पहले तेलादि से मालिश करके श्री जी का झीलना होता है । कोई श्री जी पर जल उड़ेलता है, कोई वस्त्र से उनके शरीर को पोंछता है । शोभादास झीलना के समय गिरने वाले जल में धरती पर लोट-पोट हो जाते हैं । इस समय भी सुन्दरसाथ वाणी गाते रहते हैं ।

इसके बाद श्री बाई जी और अन्य सुन्दरसाथ बहुत प्रेमपूर्वक श्री जी को भोजन परोसते हैं । श्री जी भोजन में शाक, रोटी, दूध-दधि, श्रीखण्ड, पान, आदि का सेवन करते हैं । कोई साथ छत्र लिए खड़ा रहता है, तो कोई रुमाल ढुलाता है । भोजन के समय भी श्री जी कोई चौपाई बोलते हैं, तो लालदास और केशव दास लिखते रहते हैं । सुन्दरसाथ प्रेम से वाणी गाकर श्री जी को रिझाते हैं, तो श्री जी भी मीठे वचन बोलकर उनको आनन्दित करते हैं । श्री जी के भोजन करने के बाद सब सुन्दरसाथ आपस में प्रसाद बांटकर खाते हैं ।

तीसरे प्रहर (१२ से ३) में श्री जी विश्राम करने के लिए पलंग पर लेट जाते हैं । यह पलंग, गादी, तकिए, आदि वस्तुएं भी सुन्दरसाथ ने स्वयं बहुत भाव से बनाए हैं । अब सुन्दरसाथ उनके चरण दबाकर सेवा का सुख लेते हैं । श्री जी लेटे-लेटे मीठी बातें करके परमधाम के सुख देते हैं । गर्मी के दिनों में कुछ सुन्दरसाथ श्री जी को पंखा ढुलाने की सेवा में आठों प्रहर तत्पर रहते हैं । श्री जी के वस्त्रों, शैय्या, आदि निजी सेवाओं का भार मुख्यतः वल्लभदास पर रहता है ।

इस समय कुछ सुन्दरसाथ परमधाम की वाणी का गायन करके श्री जी को रिझाते हैं । यह श्री प्राणनाथ की वाणी (श्री कुलजम सरूप) की महिमा है कि उसको गाने से परब्रह्म का दर्शन होता है । प्रत्येक प्रहर में अलग-अलग सुन्दरसाथ बारी-बारी से गायन करते हैं तथा श्री जी के साथ अन्य सुन्दरसाथ भी वाणी गायन सुनते हैं । चन्द्रावली हर बारी में गायन में सहायता करती हैं ।

चौथे प्रहर (३ से सायं ६) में श्री जी पलंग से उठते हैं । कुछ सुन्दरसाथ प्रेम से उन पर मोरछल ढुलाते हैं । श्री जी कुर्सी पर विराजमान हो जाते हैं और सुन्दरसाथ उनके चरण पखालते (धोते) हैं । सुन्दरसाथ उस जल की प्रसादी बांटते हैं । फिर सुन्दरसाथ श्री जी के हाथ पखालते हैं और उन्हें पीने के लिए काढ़ा देते हैं ।

इसके बाद श्री जी तख्त (सिंहासन) पर विराजमान होते हैं और साढ़े चार बजे वे सबको परमधाम की चितवन करवाते हैं । इस समय कुछ सुन्दरसाथ ढाल-तलवार, तीर-कमान पकड़कर खड़े रहते हैं । इसके बाद श्री जी तैयार होते हैं और महाराज छत्रसाल उन्हें आभूषणों से सजाते हैं ।

पांचवे प्रहर (सायं ६ से ९) में श्री जी तख्त पर विराजमान हो जाते हैं । तब लच्छो बाई अर्ज करती हैं कि आज कौन से घाट पधारेंगे ? श्री जी उत्तर देते हैं कि आज पाट घाट पधारेंगे । श्री बाई जी सुखपाल में बैठकर आती हैं और श्री जी से भोजन करने की अर्ज करती हैं । माणिक भाई श्री जी के हाथ पखालते हैं ।

महाराज छत्रसाल अपने मुख पर रुमाल बांधकर स्वयं श्री जी को भोजन कराते हैं और साथ में प्रेम भरी मीठी बातें करते हैं । श्री जी सब तरह की शाक-तरकारी का सेवन करते हैं । कुछ सुन्दरसाथ गायन करके श्री जी को रिझाते हैं, तो वे उन्हें एक कौर प्रसाद दे देते हैं । श्री बाई जी से बात करते-करते श्री जी रीझकर उन्हें तख्त पर साथ बैठने को कहते हैं । छबील दास जल की सेवा करते हैं ।

भोजनोपरांत कुछ सुन्दरसाथ फूलों की कलंगी श्री जी को अर्पित करते हैं । श्री जी उसे अपनी पाग में लगाते हैं । इस समय "संझा को अवसर" गाया जाता है । महाराज छत्रसाल, शेख बदल, लाल खान, आई जी (श्री तेज कुंवरी की माता) श्री जी पर मोरछल ढुलाते हैं । श्री जी प्रतिदिन प्रातः और सायं परमधाम में विराजमान युगल स्वरूप की शोभा व श्रृंगार का वर्णन करते हैं । जिसका दिल निर्मल हो और जिसमें परमधाम का अंकुर हो, वही इस वर्णन को निष्टाबद्ध होकर सुन सकता है ।

अब आरती का समय हो जाता है । इस समय सब सुन्दरसाथ एकत्रित हो जाते हैं । श्री जी के माथे पर श्री बाई जी तिलक करती हैं, फिर आनन्दपूर्वक उनकी आरती उतारती हैं । आरती में ३२ दीपक हैं और उसका प्रकाश सब दिशाओं में फैलता है । साथ ही साथ कुछ अन्य सुन्दरसाथ अपने हाथ में थाली में दीपक लेकर आरती उतारते हैं । सब सुन्दरसाथ मिलकर आरती गाते हैं- "कंचन थाल चहुं मुख दिवला, दीपक जोत प्रकासी..." ।

आरती के समय कुछ सुन्दरसाथ चंवर ढुलाते हैं । भाखरिया नाचने लगते हैं । कुछ सुन्दरसाथ मृदंग, झांझ और ताल बजाते हैं । आरती की धुन सुनकर दज्जाल (कलियुग) कांपने लगता है कि यह निश्चित उसको मार देंगे ।

एही अक्षरातीत हैं, एही हैं धनी धाम । एही महम्मद मेहंदी ईसा, एही पूरे मनोरथ काम ॥ (बीतक ६८/७२)

इस प्रकार प्रतिदिन बंगला जी में आनन्द की लीला होती है । आरती के बाद सबको थोड़ा-थोड़ा पान के बीड़े का प्रसाद बांटा जाता है । रात्रि नौ बजे तक दर्शन करने वालों की चहल-पहल बनी रहती है ।

छठे प्रहर (रात्रि ९ से १२) में श्री जी चर्चा करते हैं और सब सुन्दरसाथ सामने बैठकर ध्यान से सुनते हैं । केशवदास वाणी पढ़ते हैं और लालदास कुरान-हदीस लेकर बैठते हैं । जब श्री जी अपनी मीठी रसना से चर्चा करते हैं, तब अद्वैत की वर्षा होती है । मुरलीधर सबसे आगे बैठकर बिना पलक झपकाए चर्चा सुनते हैं । महाराज छत्रसाल और उनके सहयोगी ठाकुर भी एक तरफ बैठकर चर्चा सुनते हैं । कोई सुन्दरसाथ पुष्टि भाव से सुनता है, कोई मर्यादा के कारण, तथा कोई प्रवाह में देखा-देखी चर्चा में बैठ जाता है ।

श्री जी चर्चा में परमधाम के २५ पक्ष, श्री राज के सातों स्वरूप, परमधाम की प्रेममयी लीलाएं, इश्क रब्द, ब्रज-रास, मुहम्मद की तीन सूरत, पांच शक्तियां जो संसार में उतरीं, आदि का वर्णन करते हैं । चर्चा सुनकर सुन्दरसाथ को ऐसा लगता है, जैसे श्री राज ने उनका हाथ पकड़कर परमधाम पहुंचा दिया है ।

सातवें प्रहर (रात्रि १२ से ३) में सेवा वाले सुन्दरसाथ श्री जी से विश्राम करने की अर्ज करते हैं, परन्तु धाम धनी तो तख्त पर बैठकर परमधाम की लीला पर चर्चा करने में मग्न हैं । खास सुन्दरसाथ बहुत ध्यान से चर्चा सुन रहे हैं । इस बीच यदि कोई सुन्दरसाथ कुछ प्रश्न पूछ लेता है, तो श्री जी उसका उत्तर देते हैं और फिर उसी विषय पर चर्चा होने लगती है । चर्चा का रस कम नहीं होता ।

इस प्रकार लगभग एक-डेढ़ बज जाता है । जब श्री जी देखते हैं कि सेवा वाले सुन्दरसाथ बहुत देर से खड़े हैं, तब वे चर्चा को विराम देकर परमधाम में श्री राज की शोभा का वर्णन करते हैं । सुन्दरसाथ श्री जी के चरणों में प्रणाम करके अपने-अपने बिछौनों पर शयन के लिए जाने लगते हैं । श्री जी भी सब सुन्दरसाथ को प्रणाम करते हैं और तख्त से उठकर पलंग पर लेट जाते हैं ।

इस समय गायन वाले सुन्दरसाथ आ जाते हैं । श्री जी प्रसन्न होकर वाणी गायन सुनते हैं । पूरे बंगला जी में मोमिन भरे रहते हैं, कोई बैठकर वाणी सुनता है, कोई सोता रहता है । जयन्ती काका की कोठरी के पास कुछ सुन्दरसाथ एकत्रित होकर श्री जी द्वारा की गई चर्चा पर अर्चा करते हैं । श्री जी दूर से आवाज लगाकर पूछते हैं कि वहां इस समय कौन-कौन सुन्दरसाथ बैठे हैं ? उस बैठक में १० से लेकर १०० सुन्दरसाथ होते हैं । श्री जी उन सुन्दरसाथ पर रीझकर कभी अपना हार, कभी अपनी कलंगी भेज देते हैं, जिसे सब सुन्दरसाथ श्रद्धा से बांट लेते हैं ।

आठवें प्रहर (रात्रि ३ से प्रातः ६) में श्री जी पलंग पर लेटे-लेटे वाणी गायन सुनते रहते हैं । हर प्रहर में अलग-अलग सुन्दरसाथ की टोली गायन करके श्री जी को रिझाती है । कभी-कभी थोड़ी देर के लिए श्री जी की आंखें झपक जाती हैं । यदि गाने वाले सुन्दरसाथ कोई शब्द आगे-पीछे करते हैं, तो श्री जी तुरन्त टोक देते हैं ।

प्रातःकाल साढ़े चार बजे सुन्दरसाथ निद्रा से उठ जाते हैं । सब सुन्दरसाथ मिलकर मंगल आरती करते हैं और फिर परमधाम की वृत्त सुनते हैं । श्री जी प्रातः परमधाम की वृत्त सुनकर बहुत खुश होते हैं । साथ ही साथ वे कहवा (काढ़ा) मंगवाकर पीते हैं । तब तक अरुणोदय हो जाता है ।

इस प्रकार आठों प्रहर श्री जी के संग रहकर सुन्दरसाथ ने बहुत आनन्द का अनुभव किया, जिसका वर्णन करना सम्भव नहीं है । वे सुन्दरसाथ धन्य-धन्य हैं, जिन्हें इस संसार में श्री राज की साक्षात् सेवा करने और उनका सान्निध्य पाने का अवसर मिला ।

अगला प्रसंग- गुम्मट मन्दिर में श्री प्राणनाथ को पधराया