गुम्मट मन्दिर में श्री प्राणनाथ को पधराया
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १३९
जब गुम्मट मन्दिर का निर्माण पूरा हो गया, तब महाराज छत्रसाल और सब सुन्दरसाथ ने बड़े प्रेम से श्री प्राणनाथ जी को गुम्मट जी में सिंहासन पर पधराया ।
गुम्मट जी की पहली मंजिल की एक गुमटी में बैठकर, श्री जी ने कई वर्षों तक एकान्त में परमधाम और युगल स्वरूप का चितवन किया ।
मन में यह संशय उत्पन्न हो सकता है कि जब श्री जी स्वयं अक्षरातीत का स्वरूप हैं, तो फिर उन्हें ध्यान करने की क्या आवश्यकता है ?
इसके समाधान में दो तर्क विचार करने योग्य हैं ।
पहला, श्री जी के लौकिक शरीर में पांच शक्तियां विराजमान हैं- अक्षरातीत श्री राज का आवेश, श्यामा जी, अक्षर, इस्राफील और जिब्रील । इन पांचों के अतिरिक्त उनके अन्दर श्री इन्द्रावती की आत्मा और श्री मेहेराज का जीव भी हैं । परमधाम की आत्मा युगल स्वरूप के प्रेम और अपने धाम के आनन्द को लिए बिना चैन से कैसे बैठ सकती है ? जीव को भी इस रस की कामना रहती है ।
दूसरा, श्री जी साहिब जी एक तरफ जहां मोमिनों के आराध्य हैं, तो दूसरी तरफ वे उनके मार्गदर्शक भी हैं । जैसा श्री जी करेंगे, सब सुन्दरसाथ उनका ही अनुसरण करेंगे । भविष्य में आने वाले सुन्दरसाथ को चितवन का महत्व दर्शाने के लिए उन्होंने स्वयं उस पर चलकर दिखाया ।
चितवन के इस दौर में किरंतन आखिर के कुछ प्रकरण भी उतरे- सैयां हम धाम चले, चलो चलो रे साथ आपन जईए धाम, अब हम धाम चलत हैं तुम हूजो सबे हुसियार, अब हम चले धाम को साथ अपना ले ।
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