पांचवे दिन की लीला को विराम
श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १४०
जो भी इस संसार में आता है, उसे प्रकृति के नियमों का पालन करना ही पड़ता है । इसी मर्यादा को ध्यान में रखते हुए श्री जी ने भी, मूल स्वरूप की प्रेरणा से, अपनी लीला को विराम दिया ।
वि.सं. १७५१ में श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया के आठवें प्रहर में (चतुर्थी प्रारम्भ होने से दो घड़ी पहले) सुबह सवा पांच बजे बंगला जी में श्री जी समाधि में लीन हो गए । पंचमी को मोमिनों ने उन्हें गुम्मट मन्दिर के भूमिगत कक्ष में स्थित झूले पर पधरा दिया ।
श्री बाई जी (श्री तेज कुंवरी) ने श्री जी के अन्तर्धान से एक वर्ष पहले ही शरीर त्याग दिया था । इस प्रकार वे सब सुन्दरसाथ में जीत चलीं और उनके समर्पण के लिए सबने उन्हें धन्य-धन्य कहा । वि.सं. १७५० में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को प्रातः नौ बजे उन्होंने प्रयाण किया ।
जिन सुन्दरसाथ को श्री जी के स्वरूप की पहचान थी, उन्होंने धाम धनी के विरह में शरीर छोड़ दिया । कुछ ऐसे सुन्दरसाथ भी थे, जिन्होंने श्री जी के अन्तर्धान की सूचना मिलने के बाद एक श्वांस भी नहीं लिया और तुरन्त देह त्याग दी । ऐसे सुन्दरसाथ धन्य-धन्य हैं और इन्होंने मोमिनों का सिर ऊंचा कर दिया । संसार में इनके जैसा बलिदान का उदाहरण मिलना कठिन है ।
जिन सुन्दरसाथ ने विरह में तुरन्त शरीर छोड़ दिया, उनके नाम हैं- शंकर हजूरी, लालमन, नारायण दास, गोदावरी, किसनी, धनजी, जसिया, अम्बो बाई, रतन बाई, राम बाई ।
अगले दो मास तक वियोग के कारण सुन्दरसाथ का धामगमन होता रहा । ऐसे सुन्दरसाथ के नाम हैं- वल्लभ दास, केशव दास, मथुरा, राम कुंवर, प्रसादी, हमीरा, शाहमन, नरसिंह दास, सन्त दास, पूर बाई, खड़गो, केसर बाई, काशी, असऊ ।
विरह में शरीर छोड़ना या न छोड़ना, यह सब श्री राज के हुक्म से होता है । महाराज छत्रसाल पर जागनी का उत्तरदायित्व था, लालदास जी से बीतक लिखवाने सहित कई सेवाएं लेनी थीं, केशवदास जी के पास वाणी की जिल्द बांधने की सेवा थी । इसलिए धाम धनी ने इनके तन को सुरक्षित रखा ।
वि.सं. १७५१ में भादो मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को श्री मेहेराज के ७६वें जन्म दिवस पर केशवदास जी ने वाणी का संकलन पूर्ण किया । सुन्दरसाथ ने गुम्मट मन्दिर में सिंहासन पर श्री कुलजम सरूप को श्री प्राणनाथ का वाङ्मय स्वरूप मानकर पधराया ।
लालदास जी ने बीतक ग्रन्थ लिखा, जिसमें श्री देवचन्द्र जी और श्री जी साहिब जी की लीला का विस्तृत और प्रामाणिक वर्णन उपलब्ध है । बीतक से आने वाले सुन्दरसाथ को श्री श्यामा जी एवं अक्षरातीत श्री राज द्वारा की गई जागनी लीला का पता चलता है ।
कोई दूजा मरद न कहावहीं, एक मेहेंदी पाक पूरन । खेलसी रास मिल जागनी, छत्तीस हजार सैयन ॥ (सनंध ४२/१६)
इस संसार में एक पवित्र पूर्ण स्वरूप श्री जी साहिब जी के अतिरिक्त किसी दूसरे को परब्रह्म कहलाने का अधिकार नहीं है । श्री जी बारह हजार ब्रह्मसृष्टि और चौबीस हजार ईश्वरीसृष्टि के साथ जागनी रास खेलेंगे (उनकी आत्मा को जाग्रत करेंगे) ।
छठे दिन में आने वाले सुन्दरसाथ श्री कुलजम सरूप के ज्ञान को आत्मसात् करेंगे, श्री जी के स्वरूप की पहचान करेंगे, और उनके बताए मार्ग पर चलकर दिखाएंगे, तभी उनकी आत्मा जाग्रत होगी । श्री प्राणनाथ के चरणों में ही सबका मिलावा होगा ।
