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परब्रह्म का संसार में आने का कारण

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग १

अक्षरातीत परब्रह्म मूल रूप से परमधाम की अद्वैत भूमिका में विराजमान हैं, जहां एक तरफ वे आनन्द स्वरूपा श्यामा जी और अपनी आत्माओं के साथ दिव्य प्रेम की लीला करते हैं, तो दूसरी तरफ उन्हीं के सत् स्वरूप अक्षर ब्रह्म नश्वर ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति-प्रलय के माध्यम से बालमयी क्रीड़ा करते हैं ।

परमधाम में अनादि काल से अक्षरातीत श्री राज जी, श्यामा जी और आत्माओं के बीच यह प्रसंग चलता रहता था कि तीनों में से किसका प्रेम बड़ा है ? सभी अपने प्रेम को बड़ा कहते थे, परन्तु इस बात का निर्णय किसी तरह नहीं हो पाता था । यह इश्क रब्द (प्रेम विवाद) ही संसार में आने का महाकारण था । श्यामा जी और आत्माओं को संसार में लाकर श्री राज जी इस विवाद का निर्णय करना चाहते थे ।

अक्षर ब्रह्म प्रतिदिन श्री राज जी के दर्शन करने आते थे, परन्तु उन्हें श्यामा जी और आत्माओं के विषय में कुछ भी पता नहीं था, न ही उन्हें प्रेम की लीला का कुछ ज्ञान था ।

एक दिन जब अक्षर ब्रह्म श्री राज जी का दर्शन करने आए, तो राज जी के हुक्म से उनकी दृष्टि श्यामा जी और सखियों पर पड़ी । इसी प्रकार श्यामा जी और आत्माओं ने पहली बार अक्षर ब्रह्म को देखा । श्री राज जी ने उन्हें बताया कि अक्षर ब्रह्म दुःख के खेल की रचना करते हैं ।

इस घटना के बाद अक्षर ब्रह्म के मन में श्री राज जी की प्रेममयी लीला देखने की इच्छा उत्पन्न हो गई, तथा श्यामा जी और सखियों के मन में अक्षर ब्रह्म का खेल देखने की इच्छा पैदा हो गई । एक दूसरे की लीला देखने की इच्छा संसार में आने का कारण बनी ।

दोनों की इच्छा को पूर्ण करने के लिए श्री राज जी ने तीन अलग-अलग ब्रह्माण्डों की रचना की । इन तीनों में अलग-अलग प्रकार की तीन लीलाएं हुई । पहली ब्रज लीला (बाल लीला), दूसरी रास लीला (किशोरावस्था में प्रेममयी लीला), तीसरी जागनी लीला (वृद्धावस्था में ज्ञानमयी लीला) ।

अब यहां उनके द्वारा की गई जागनी लीला का वर्णन किया जा रहा है ।

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