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दस नाम सन्यासी की विधि

श्री प्राणनाथ लीलामृत - प्रसंग ७३

इसके बाद दस नाम सन्यास मत के आचार्यों ने श्री प्राणनाथ जी से कहा- "अब हम अपने इष्ट आदि के बारे में प्रमाणों के साथ आपको बताते हैं । हमारी सात मन्याएं और चार मठ हैं । आप हमारे मत को परमहंस मत जानिए ।"

पहली मन्या (पश्चिम)

"पहली मन्या पश्चिम की है और वहां शारदा मठ है । इसका क्षेत्र द्वारका है । इसके देवता सुदेचर हैं ।

"इस मन्या की देवी भद्रकाली हैं । इसमें गंगा और गोमती नदी को तीर्थ माना जाता है । इसके आचार्य अनुभूति स्वरूप हैं ।

"इस मन्या के सम्प्रदाय का नाम कीटवार है । इससे सम्बद्ध सन्यासियों के नाम के बाद 'तीर्थ' और 'आश्रम' शब्द जोड़ा जाता है । इसके देवता ब्रह्मा और विष्णु भगवान हैं ।

"इस मन्या का दीक्षा मन्त्र है- ॐ ह्रीं नीलहंसः सोऽहम् परमहंसः । ॐ सोऽहम् सिद्धान्त भास्करोऽहम् । स्वदेचर देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति ॥"

दूसरी मन्या (पूर्व)

"दूसरी मन्या पूर्व की है । वहां पर गोवर्धन (जगन्नाथ पुरी) मठ है । इससे जुड़े सन्यासियों के नाम के बाद 'वन' और 'आरण्य' शब्द जोड़ा जाता है । इसके सम्प्रदाय का नाम भोगवार है ।

"इस मन्या का क्षेत्र पुरुषोत्तम (जगन्नाथ पुरी) है । इसके देवता भगवान जगन्नाथ (श्री कृष्ण) हैं । इसके आचार्य बलभद्र और पद्माचार्य हैं ।

"इस मन्या का तीर्थ रोहिणी नदी और महोदधि (सागर) हैं । इसकी देवी विमला (लक्ष्मी) हैं ।

"इस मन्या का दीक्षा मन्त्र है- ॐ सोऽहम् मठः प्रतीच्यात्सर्वदिड मुखेन नमस्ते करोम्यहम् । जगन्नाथो देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति मन्त्रः ॥"

तीसरी मन्या (उत्तर)

"अब तीसरी मन्या के विषय में सुनिए, जो उत्तर दिशा की है । इसका मठ जोशीमठ है । इसके सम्प्रदाय का नाम आनन्दवार है । इसका क्षेत्र बद्रीनाथ है ।

"इस मन्या के देवता नर और नारायण हैं । इससे जुड़े सन्यासियों के नाम के बाद 'गिरि', 'पर्वत', 'सागर' शब्द जोड़ा जाता है । इसके आचार्य नरातोटक हैं ।

"इस मन्या का तीर्थ और मुक्ति का स्थान अलकनन्दा नदी है । इसकी देवी पुण्यगिरि हैं ।

"इस मन्या का दीक्षा मन्त्र है- ॐ सोऽहम् हंसः तत्वमसि अहं ब्रह्मास्मि । नारायणो देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति मन्त्रः ॥"

चौथी मन्या (दक्षिण)

"चौथी मन्या दक्षिण दिशा की है, जहां श्रृंगेरी मठ है । इससे जुड़े सन्यासियों के नाम के बाद 'पुरी', 'भारती', 'सरस्वती' शब्द जोड़ा जाता है ।

"इस मन्या के सम्प्रदाय का नाम भूरिवार है । इसका क्षेत्र रामेश्वर है । इसके देवता शंकर जी और आदि बाराह हैं । इसकी देवी कामाख्या हैं ।

"इस मन्या के आचार्य श्रृंगी ऋषि और पृथ्वीधर हैं । इसका तीर्थ तुंगभद्रा नदी है ।

"इस मन्या का दीक्षा मन्त्र है- ॐ भूर्भुवः स्वः ब्रह्म ॐ क्लीं स्मीति सोऽहम् आत्मा तत्वमसि अहं ब्रह्मास्मि सोऽहम् हंसः । आदि वाराहो देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति मन्त्रः ॥"

पांचवी मन्या

"पांचवी मन्या का नाम ऊर्ध्वा है । इसका मठ सुमेरु पर्वत है । इस सम्प्रदाय का प्रारम्भ काशी में हुआ था ।

"इस मन्या का ज्ञान क्षेत्र कैलाश है । इसके देवता निरंजन (निराकार) हैं । इसकी देवी माया हैं । इसके आचार्य ईश्वर (महाविष्णु) हैं । इसका तीर्थ मानसरोवर है ।

"इस मन्या का दीक्षा मन्त्र है- ॐ नीलहंसः परमहंसः सोऽहम् तत्वमसि । निरंजनो देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति मन्त्रः ॥"

इसे सुनकर श्री जी ने अपने चित्त में विचारा कि इसमें तो कुछ भी जगत से परे की बात नहीं है ।

छठी मन्या

छठी मन्या की विधि को सभी अगम और अगाध कहते हैं । यह दसों नाम वाले सन्यासियों के लिए वन्दनीय है और वे अनेक प्रकार से इसकी प्रशंसा करते हैं ।

"छठी मन्या का नाम आत्मा है । इसका मठ मूल परात्म है । इसकी सम्प्रदाय सत सन्तुष्ट है । इसमें योग मार्ग पर चला जाता है ।

"इस मन्या का क्षेत्र नाभि है । इसके देवता परमहंस हैं । इसकी देवी मनसा हैं । इसके आचार्य चेतन व्यापक (आदि नारायण) हैं । इसका तीर्थ त्रिकुटी (इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी का मिलन स्थान) है । इसका क्षेत्र सरोवर है ।

"इस मन्या का दीक्षा मन्त्र है- ॐ सोऽहम् हंसः तत्वमसि पदं, ब्रह्मत्वं पद माया असिपदं । तत्पदं जीवो ब्रह्म । परमहंसो देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति मन्त्रः ॥"

जब श्री जी ने इस पद्धति को सुना तो वे विचार करने लगे कि इसमें तो आत्म-तत्व और सुन्दरसाथ की बात है, जिसे इन लोगों ने शरीर पर घटा लिया है ।

सातवीं मन्या

"अब सातवीं मन्या की पद्धति सुनिए । इसमें ब्रह्मा जी के पुत्र सनकादिक को शिखा माना गया है । यज्ञोपवीत को सूत्र कहा गया है । यह मन्या जम्बू द्वीप में भरत खण्ड के अन्तर्गत है ।

"इस मन्या का दीक्षा मन्त्र है- ॐ ह्रीं नीलहंसः सोऽहम् परमहंसः । सच्चिदानन्दो देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति मन्त्रः ॥

"यह सातवीं मन्या की पद्धति है ।

"चार मठों के ब्रह्मचारियों के नाम में आनन्द, स्वरूप, चेतन, प्रकाश शब्द जोड़ा जाता है ।

"सन्यासियों के आध्यात्मिक स्तर के अनुसार उन्हें हंस, परमहंस, बोध, कुटीचर उपाधि दी जाती है ।"

इस प्रकार सातों मन्या के सन्यासियों ने अपनी-अपनी पद्धति, दीक्षा के मन्त्र, तथा सिद्धि देने वाले १२ परमहंस गायत्री मन्त्रों के विषय में विस्तार से बताया । श्री जी ने सब कुछ बहुत ध्यान से सुना ।

इसके बाद सन्यासियों ने श्री प्राणनाथ जी से कहा-

"सन्यास मत ग्रहण करने से माता-पिता का उद्धार, अपने शरीर और प्राण का कल्याण, तथा पूर्व जन्म का उद्धार होता है । गुरु चरणों की महिमा से कुल जाग्रत हो जाता है और करोड़ों घोर पाप नष्ट हो जाते हैं । सन्यास मत ग्रहण करने से नारायण की प्राप्ति होती है, जो सम्पूर्ण जगत में व्यापक हैं ।

"सन्यास मत युगों-युगों से चला आ रहा है और यह वेद में भी वर्णित है । गुरु दत्तात्रेय ने इस मत को प्रकाशित किया और आदि शंकराचार्य ने इसका प्रचार किया ।

"चारों युगों के सन्यास मत के आचार्यों के नाम हम आपसे कहते हैं, कृपया ध्यान देकर सुनिए ।

"सतयुग में सन्यास मत के तीन आचार्य हुए- ब्रह्मा, विष्णु, शिव । त्रेता युग में भी तीन आचार्य हुए- वशिष्ठ, शक्ति, पराशर । द्वापर युग में दो आचार्य हुए- व्यास और शुकदेव । कलियुग में पुनः तीन आचार्य हुए- गौड़, गोविन्द, आदि शंकराचार्य ।

"आदि शंकराचार्य के चार मुख्य शिष्य हुए- ब्रह्माचार्य, पद्माचार्य, नरातोटकाचार्य, श्रृंगी ऋषि । यही चार आचार्य चारों दिशाओं में स्थापित चार मठों के पहले आचार्य बने ।इन चार आचार्यों के दस शिष्य हुए ।

"ब्रह्माचार्य के शिष्य हुए स्वरूपाचार्य, जिनके दो शिष्य हुए- तीर्थ और आश्रम । पद्माचार्य के शिष्य हुए बलभद्र, जिनके दो शिष्य हुए- वन और अरण्य । नरातोटकाचार्य के तीन शिष्य हुए- गिरि, पर्वत, सागर । श्रृंगी ऋषि के भी तीन शिष्य हुए- सरस्वती, भारती, पुरी ।

"इन दस सन्यासियों के नाम से ही दस नाम सन्यास मत प्रारम्भ हुआ ।"

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